Wednesday, March 18, 2009

उड़ें जब जब ज़ुल्फें तेरी

उड़ें जब जब ज़ुल्फें मेरी


कल ही की बात कि है मोटर साइकल पर सवार दो नौजवान सड़क पर सीधे चलते-चलते वापस लौट पड़े।इसके बाद एक के बाद एक दुपहिया वाहन बीच रास्ते से वापस लौटते देख मेरा माथा ठनका कि आखिर माजरा क्या है।आगे रास्ते में कहीं कोई बेरियर लगा है या फिर कोई बंम फूट गया है जो सभी वापस आ रहे हैं।हमने सोचा हो सकत है आज सड़क के उस पार वाले मोहल्ले में हडताल हो।
बामुश्किल एक नौजवान को हमनें रोक कर पूछा -बेटा क्या हुआ जो तुमने अपनी बाइक बीच रास्ते से वापस मॊड़ ली।अचानक आज सभी को कुछ याद आ गया क्या, या फिर सड़क पर जाम लगा है। वह तुरंत बॊला -आप भी अंकल कैसी बतें करते हैं।वहाँ न तो कोई जाम लगा है और ना ही मुझे कुछ याद आया है । आगे चौराहे पर पुलिस खड़ी है ?
हमने अचरज से पूछा - तो क्या हुआ उनका तो रोज का काम है। तुम भला क्यों भाग रहे हो तुमनें कहीं कोई चोरी की है क्या ? या फिर किसी का एक्सीडेंट करके भाग रहे हो।इतना सुनते ही वह नौजवान भडक गया देखो- अंकल ऐसी बाते मत करो तुम्हें क्या मैं भगोड़ा दिखाई दे रहा हूँ ?
मैनें उसे शांत करते हुऐ कहा-नहीं बेटा तुम तो पढ़ने लिखने वाले नेक घर के शरीफ बच्चे लगते हो ।फिर भी बेटा ऐसे क्यॊं भाग रहे हो ?वह चिढ़ गया और बोला- चौराहे पर जो काका जी खड़े हैं ट्रेफिक पुलिस वाले हैं। हेलमेट की चॆकिंग कर रहे हैं और जिनके पास हे्लमेट नहीं हैं उनका चालान भी बना रहें हैं।
हमारी मोटी बुद्धी में अब जाकर बात घुस पाई,ओर बोले- भैय्या सीघे-सीधे क्यों नहीं कहते हो कि तुम चालान के ड़र से वापस भाग रहे हो। अब उन्हें कौन समझाये कि ये ट्रेफिक पुलिस वाले जो दिन भर माथा -कूट कर रहें हैं तुम्हारे ही भले के लिऐ कर रहे हैं ।जान हमारी और चिन्ता करनी पड़ रही है बेचारी पुलिस को, है न अजीब बात....? क्योंकि हम बिना भय के समझते नहीं हैं इसलिऐ कभी उन्हें चालान का ड़र ,तो कभी गाड़ी जप्त करने का ड़र दिखाना पड़ता है।और बार -बार समझाना पड़ता है कि भैय्या अपने माथे पे सुरक्षा कवच यानि कि हेलमेट पहन लो वरना दु्र्घटना होने पर दिमाग की चोट अच्छे-अच्छॊ का दिमाग खराब कर देती है।
लेकिन मानव स्वभाव है कि उनने समझाने पर भी बार बार भूल जाता है कि हमारे एक मात्र सिर की रक्षा से हम बददीमाग होने के खतरे से बच सकते हैं ।जब- जब पुलिस चालान बनाने का डर दिखाती है तो फोरन ही सड़कों पर टोपाघारी दुपहिया वाहन चालकों की संख्या में बढ़ोतरी हो जाती है और सड़क पर हेलमेट ही हेलमेट नजर आने लगते हैं।पुलिस ने जरा सी सुस्ती की नहीं कि सबके सर से हेलमेट भी गधे के सर से सींग की तरह गायब हो जाता है।
हमनें कॉलेज स्तर के एक छात्र से एक दिन पूछा- बेटा हेलमेट क्यॊं नहीं लगाते ,यह तो तुम्हारी सुरक्षा के लेऐ है।वह तपाक से बोला-देखते नहीं कल ही बालों की सेटिंग कराई है।हेलमेट लगाकर क्या सारे बालों की एसी-तैसी कर दूँ।बात भी सही है बालों की सेटिंग के बाद यदि किसी को पता ही न चले कि बाल किस खूबसूरती से हवा में लहराते हैं तो लानत है ऐसे बालों पर......!एक युवति से जब हमने हेलमेट नहीं लगाने पर सवाल किया तो वह भी अपने बालों के प्रति ज्यादा चिन्तित थी।बोली इस हेलमेट के चक्कर में सारी हेयर स्टाइल ही खराब हॊ जाती है ।इन पुलिस वालों को भी न जाने क्या होता है कि जब चाहे ड़ंड़ा लेकर पड़ जाऐगें। सर हमारा बाल हमारे ,हम चाहे जैसे रहे इन्हें क्या....?
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि लोग अपनी जान से ज्यादा बालों के लिऐ चिंतित हैं।यानि कि बाल है तो जहान है।हम अपने बालों को सजाते सवारते हैं और सरकार है कि नित नये कानून बनाकर बालों को हेलमेट के अंदर बंद कर देना चाहती है। बेचारे बालों का तो हेलमेट के अंदर घुटन में दम ही निकल जायेगा ।लेकिन जिनके सर पर गिनती के बाल बचे हैं उनका अलग ही तर्क है,कहते हैं- भैय्याजी वैसे भी सर पर गिनती के ही बाल है कम से कम इन्हें तो खुली हवा सांसे लेने दो। अब उन्हें कोन समझाऐ कि यह बची-खुची तुम्हारी खेती तो तब ही सुरक्षित रह पाऐगी जब तुम सही सलामत रहोगे।
लेकिन सुनता कौन है । लगता है सभी को बालों की चिंता जान से भी ज्यादा है।तभी तो उनके मन में शायद यह गाना नोन-स्टोप बजता रहता होगा---उड़े जब जब ज़ुल्फें तेरी कंवारियों का दिल मचले........!
अब कंवारियों का दिल तो मचलेगा तब मचलेगा समय समय पर ट्रेफिक पुलिस का ड़ंडा जरूर मचाल जाता हैऔर यदि सामने वाले वाहन का दिल मचल गया तो भैय्या फिर गई भैस पानी में......! घर वाले भी उस दिन को याद करके रोऐंगे जिस दिन उन्होंने राज दुलारे को दुपहिया लेकर दिया ।


डॉ.योगेन्द्र मणि

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