Thursday, November 3, 2011

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Sunday, October 10, 2010

राज की नीति

राज की नीति.......!

शहर की सडकों पर कुछ दिनों से रोजना युवाओं के दौडते फर्राटेदार वाहनों और उस पर जिन्दाबाद का शोर,बरबस ही शहर के जिन्दा होने का प्रमाण दे जाता है।युवाओं की भागदौड देखकर लगा कि शायद किसी आन्दोलन या फिर बाजार बन्द की तैयारी चल रही है। लेकिन हमारे अनुमान पर भैय्याजी के पिचके आम से चेहरे ने पानी फेर दिया।उनका निचुडा सा चेहरा देख,हमने पुछ ही लिया कि भैय्या जी आखिर माजरा क्या है...?युवाओं के जोश को देख कर वे काहे को दुबले हुऐ जा रहे हैं ?

भैय्या जी तपाक से बोले -तुम्हें मालूम है कि युवाओं में इतना जोश क्यों है ...?

--क्यों है भला.....?

--कॉलेज में चुनाव हैं और ये सभी छात्रसंघ के चुनाव में पसीना बहा रहे हैं.......

हमें बडा आश्चर्य हुआ कि चुनाव कॉलेज में हो रहे हैं और चेहरे की हवाइयां भैय्या जी की उड रही हैं ।हमारी मनसिक स्थिति समझकर भैय्या जी स्वयं ही शब्दों की जुगाली करने लगे-तुम्हें मालूम है शर्मा जी हमारे लाडले भी छात्रसंघ अध्यक्ष का चुनाव लड रहे हैं.......

-

तो भला इसमें इतना मायूस होने की क्या बात है....तुम्हें तो खुश होना चाहिऐ....?

भैय्या जी मुँह फाडकर अचरज से हमारी तरफ देखते हुऐ बोले - इसमें खुश होने जैसी क्या बात है......?

अब हमने अपने ज्ञान का पिटारा खोलते हुऐ उन्हें समझाया कि देखो भैय्या जी तुम्हारा लाडला सपूत आज छा्त्रसंघ अघ्यक्ष का चुनाव लड रहा है तो कल नगर पालिका का चुनाव लडेगा....फिर एम.एल..,और एम.पी. का भी चुनाव लड सकता है.....और भगवान के साथ यदि जनता और आलाकमान का भी साथ रहा तो बस फिर क्या है.......? फिर तो पाँचों घी में और..................!तुम्हें मालूम है कि ला्डला डिग्री लेकर कहीं नौकरी भी करेगा तो भला क्या मिलेगा......?जिन्दगी भर की नेताजी की गुलामी.....!बाबू नहीं तो ज्यादा से ज्यादा आई..एस अफसर बन जाऐगा बस .....चाकरी तो विधायक...सांसद और मंत्री जी की करनी पडेगी......मंत्री जी यदि कहते हैं कि मँहगाई नहीं बढ रही है तो अफसर को भी कहना पडता है कि सब ठीक है ....क्योंकि मन्त्री और नेता लोग कभी गलत नहीं होते हैं....।गलत होती है तो केवल भोली जनता .........

अब जनता हाय मँहगाई....हाय मँहगाई कर रही है लेकिन सरकार है कि जैसे साँप सूँघ गया हो.... ...।मजदूरों और सरकारी कर्मचारियों को अपना वेतन बढवाने के लिऐ न जाने कितने पापड बेलने पडते हैं ....आन्दोलन करने पडते हैं....लाठियाँ तक खानी पडती हैं ...लेकित तब भी कोई जरूरी नहीं कि सरकार के कान पर जूँ रैंग ही जाऐ.......? कई बार तो नौकरी के लाले और पड जाते हैं.......

लेकिन राजनीति में आने पर नेता जी को भला काहे की चिन्ता...........क्योंकि सैय्या भये कोतवाल तो डर काहे का.......।जब मरजी आऐ वेतन बढाओ...........जितने चाहे भत्ते बढाओ...........चन्द मिनटों में ही वेतन बढोतरी का बिल पास..... .....न हडताल की जरूरत और न ही डण्डे खाने की नौबत..........!हकीकत तो यह है कि इन नेताओं को तो शायद वेतेन भत्तों की जरूरत ही कहाँ पडती होगी......?मान भी लिया जाऐ कि मामूली से वेतन- भत्तों में काम नहीं चल रहा तो भला राजनीति में आने पर एक ही चुनाव जीतने के बाद नेता जी के पास करोडों की सम्पत्ति भला कहाँ से और कैसे आ जाती है यह पहेली आम जनता की तो समझ से सदा ही परे रही है.............। मँहगाई से भी कई गुना तेज गति से नेता जी की सम्पत्ति बढती जाती है.........!पडोसियों, मित्रों, और पार्टी के पसे से एक बार चुनाव लडकर जीतने के बाद जनता की सेवा हो या न हो स्वयं और स्वयं के परिवार कीतो जी भर के सेवा हो ही जाती है.....

एक साधारण कर्मचारी को तो अपनी छत और बच्चों की पढाई के लिऐ बैंक लोन का जुगाड करने में ही जिन्दगी बीत जाती है क्योंकि खुद की कमाई में तो या तो बच्चों को खिला ले ..या फिर मकान और बच्चों की पढाई का सपना पूरा कर ले.........!

तभी हमारा ध्यान भैय्या जी की और गया तो हमने पाया कि वे मुँह फाडे आसमान को ताक रहे थे....।हमने उन्हें झंझोडते हुऐ कहा कि भैय्या जी कहाँ खो गये......?भैय्या जी नींद से जागते हुऐ बोले.- कहीं नहीं शर्मा जी......सांसद बेटे के बंगले में पोते- पोतियों को खिला रहा था.............!

डॉ.योगेन्द्र मणी कौशिक


Monday, June 1, 2009

मलाईदार -मलाई

मलाईदार -मलाई
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जब से मनमोहनी सरकार ने दोबार से होश संभालन शुरु किया, तभी से समाचार पत्रों में मलाईदार विभाग बडी ही चर्चा का विषय रहा है।जनता तो मनमोहन सिंह की मोह-मा्या में फंस गई लेकिन सरकारी बैसाखियां हैं कि मलईदार मंत्रालयों के दरिया में डुबकी लगाने की तैयारी में जुट गई थी।नतीजा सामने है कि मनमोहन की मोहनी सूरत पर मुस्कान आने से पहले ही गायब हो गई और मंत्रियों की घोषणा वे खुले मन से नहीं कर पाऐ।
पिछली बार जब सरकार बनाई थी तो कभी लेफ्ट गुर्राता था तो कभी राइट.....। बडी मुश्किल से संसदीय कुनबे की संभाल पूरे पाँच साल तक की जा सकी...?इसबार जनता ने कूछ दमदारी से उन्हें सरकार की कमान संभलाई तो लगा था कि कमसे कम इस बार तो सिंह साहब अपनी इच्छा से सांस ले सकेगें और लगाम केवल पार्टी सुप्रीमो के पास एक ही हाथ में रहेगी लेकिन इस बार भी बेचारे करुणा और ममता के साथ पंवार की पावर के चक्कर में फंस ही गये। सिंह सहब को एक बार फिर सरकार की इन बैसाखियों की रिपेयरिंग के लिऐ आला कमान की शरण में जाना ही पडा.......। वहाँ से बैसाखियों की रिपेयरिंग करवाकर जनता के सामने नई पुरानी चाशनी से युक्त मलाई -मक्खन वाले विभागों का तलमेल बिठाकर पेश किया गया ।
इस मलाई दार के शोर की गूँज हमारी श्रीमती के कानों में भी पहुंचनी लाजमी थी। तभी तो उन्होंने एक दिन हमसे पूछ ही लिया-ये मलाईदार क्या बला है....?
हमने अपनी कुशाग्र बुद्धी का प्रमाण देते हुऐ तुरन्त जबाब दिया- दूध..... अच्छा बढिया वाला दूध ....मलाईदार होता है...!हमार इतना कहना था कि हमें लगा जैसे बिना गैस का चूल्हा जलाऐ ही दूध में उफान आने वाला है.....? श्रीमती जी तुरन्त बोली-आप क्या मुझे उल्लु समझते हैं.....? सभी मंत्री पद के लिऐ मलाईदार विभाग ढुढ रहे हैं .... मैं पूछती हूँ कि मन्त्रालयों में मलाई भला आई कहाँ से.....? वहाँ क्या पंजाब से भैंस लाकर बांध रखी हैं मनमोहन जी ने.....?
अब भला हम श्रीमती जी को कैसे समझाऐं कि जिस विभाग में दान दक्षिणा और ऊपरी कमाई की जितनी अधिक गुंजाइश होती है वह विभाग सरकरी भाषा में आजकल मलाईदार विभाग कहलाता है ....।अब कहने के लिऐ तो सभी जन सेवक हैं। जनता की सेवा करने के लिऐ ही सभी राजनीति में आऐ हैं।तभी तो पाँच साल में ही बेचारे जनता का दुख-दर्द ढोते- ढोते करोडपति हो जाते हैं......।
अजीब गोरख-धंधा है ऊपर वाले का भी.......! जनता पसीना बहाते- बहाते रोटी के जोड-भाग में हाँफने लगती है लेकिन नेता जी उसी पसीने में इत्र डालकर नहाने से करोडपति हो जाते है.......? तभी तो मन्त्री बनते समय किसी को भी इस बात कोई चिन्ता नहीं होती कि गरीब का उद्धार कैसे होगा सभी की मात्र यही गणित होती है कि जनता का कुछ हो या न हो मेरे परिवार का उद्धार कैसे होगा..........?और वह अपने कुनबे की गरीबी दूर करने में सफल भी हो ही जाता है... बेचारी जनता का क्या है उसे तो वोट देनी है अगले चुनाव आऐगें तो फिर एक बार वोट दे देगी........!!

डॉ. योगेन्द्र मणि

Friday, May 29, 2009

सुप्रीमो को सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण

सुप्रीमो को सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण

-अजी सुनते हो.......! सुबह-सुबह चाय के कप से भी पहले श्रीमती जी की मधुर वाणी हमारे कानों में पडते ही हम समझ जाते हैं कि आज जरूर कोई नई रामायण में महाभारत होने होने वाली है। आप सोचते होगें कि अजीब प्राणी है । भला रामायण में महाभारत की क्या तुक है। दोनों का एक दूसरे के साथ भला क्या तालमेल....?लेकिन बन्धु ऐसा ही होता है शादी-शुदा जिन्दगी में सब कुछ संभव है।जब मेरे जैसे भले जीव के साथ हमारी श्रीमती जी का निर्वाह संभव हो सकता है तो समझ लीजिऐ कि रामायण में महाभारत भी हो सकती है। श्रीमती की वाणी से वैसे ही हमारे कान ही क्या रौंगटे तक खडे हो जाते हैं। हम तपाक से बोले -‘-बेगम तुम्हें तो मालूम ही है कि हम जब भी सुनते हैं तो केवल तुम्हारी ही सुनते हैं वर्ना किसी की क्या मजाल कि हमें कूछ भी सुना सके.........?’--सुनोगे क्यॊं नहीं भला......? हजार बार सुनना पडेगा..... अब तो आप कुछ भी नहीं कर सकते.......!_-भागवान हम तो पहले ही तु्म्हारे समने हथियार डाले खडे हैं फिर भला किस बात का झगडा......? -झगडा कर भी कैसे सकते हैं आप......?-क्यों झगडा करने पर क्या सरकार ने टेक्स लगा दिया है या फिर संविधन में कोई संशोधन लागू हो गय है जिससे मर्दों की बोलती बन्द हो गई है...?-ये पढिये अखबार... सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों ने कहा है कि यदि शांति चहते हो तो धर्म पत्नी की बात माननी होगी....!-इसमें भला नई बात क्या हुई......? हर कोई समझदार पुरुष जानता है कि गृह शान्ती के लिऐ गृहमंत्राणी को प्रसन्न रखन जरूरी है । समझदार मर्द की बस यही तो एक मात्र मजबूरी है । और पत्नी है कि पुरुष की समझदरी को कमजोरी समझकर भुनाने लगती है .।शादी के समय पंडित जी भी बेचारे पुरुष को सात बचनों में इस तरह बांध देते हैं कि यदि पुरुष को वे वचन याद रह जाऐं तो आधा तो बेचारा वैसे ही घुट-घुट कर बीमार हो जाऐ । आजादी से सांसे लेने पर भी बेचारे के पहरे लग जाते है।इसीलिऐ हमारे जैसे बुद्धीमान लोग ऐसी दुर्घटनाओं को याद ही नहीं रखते। शायद इसीलिऐ अभी तक श्रीमती के साथ रहते हुऐ भी सभी बीमरियों से मुक्त हैं और शत-प्रतिशत स्वस्थ्य हैं ।अब आप ही बताऐं कि भला सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों को सरे आम ऐसी नाजुक बाते कहने कि क्या जरूरत थी....? उन्हें मालूम होना चहिऐ कि आजकल ऐसी खबरें महिलओं तक जल्दी पहुंचती है ।क्योंकि साक्षारता का प्रतिशत भी तो काफी बढ गया है। वसे भी सुप्रीमो को भल किसी कोर्ट के संरक्षण की क्या जरुरत ......संरक्षण तो हम जैसे निरीह प्राणियों को चाहिऐ........?
अब आगे -आगे देखिये होता है ,
न्याय उनका हो गया रोता है क्या ॥

डॉ.योगेन्द्र मणि

Saturday, May 16, 2009

जय हो......!

जय हो.........!.लोकतन्त्र......!! जय हो .....!!!
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लोकसभा चुनाव के प्रारम्भ में किसी ने नारा लगाया जय हो, तो किसीने गजल के काफिये की तरह कहा भय हो, तो कोई इससे भी चार कदम आगे बढ़ गया और बोला-कै हो.....! अब चुनाव समाप्त होने साथ ही ई.वी.एम. मशीनों में बन्द नतीजे भी सबके सामने हैं ।जिसने सबसे पहले जय हो का नारा लगाया उसकी जय हो गई और भय हो का नारा लगाने वालों को जनता ने नतीजों से भयभीत कर दिया.......।चुनावी नतीजों से यह बात तो स्पष्ट है कि जनता अब नेताओं की बांदी नहीं है कि जिसे नेता अपने हित के लिऐ औजार के रूप में इस्तेमाल कर सकें.....?
चुनाव के पहले कुछ अति उत्साहित कुर्सी भक्तों ने कुर्सी दौ्ड़ में सभी नैतिकताओं को दरकिनार कर सत्ता सुखकी चाह में जनता को गुमराह कर इधर-उधर दौड लगाई लेकिन जनता ने उन्हें सबक सिखाते हुऐ चौराहे पर लकर खडा कर दिया । जहाँ से उन्हें अब सोचने पर मजबूर होना पड रहा होगा कि उन्हें भला बिना सोचे समझे जय हो का नारा छोड कर अलग से ही अपनी खिचडी पकाने की क्या जरूरत थी ।लालू- पासवान की यादवी जुगलबन्दी टांय- टांय फिस्स हो गई....।राम जी ने भय हो के नारों से नाता तोड लिया । उन्हें तो एक मात्र राम जी का ही था जब उन्होंने ही नाता तोड लिया तो ऐसे में राम भक्तों के दिल पर क्या बीत रही है यह तो वे ही बत पायेगें,लेकिन शायद राम जी को भी मालूम हो गया है कि आजकल लोग उसका नाम केवल जनता से वोट के लिऐ ही करते हैं वोट लेने के बाद सब भूल जाते हैं कि मन्दिर कहाँ पर बनना है काश राम जी का नाम वॊट लेने के बाद भी वे ध्यान रखते तो शायद राम जी भी उनका कुछ तो ख्याल रख ही लेते......?अब भैय्या जी से हमने कहा कि अब राम जी कहाँ रहेगें तो वे भी तपाक से बोले- कहीं भी रहें हमें क्या.....? जब उन्हें ही अपने ठिकाने की चिन्ता नहीं है तो हम भी क्यों दुबले हों.....?
चुनाव की घोषणा होते ही जो सत्ता सुख भोग रहे थे उनमें से कुछ ने सोचा कि अब तो हम ही हम हैं , और हम भला किसी से कहाँ कम हैं ।बस फिर क्या था पैर का एक अंगूठा सत्ता की नाव पर रखा और दूसरा पैर लगा जमीन तलाशने.....अब दूसरा पैर रखने की जमीन तो मिली नहीं सत्ता की नाव भी अंगूठे के नीच से खिसकने लगी है।क्योकि इन्होंने सोचा था कि अगर यह नाव डूब गई तो दूसरी नाव में तुरन्त ही छलांग लगा लेगें लेकिन हार री किस्मत बीच में ही धोखा दे गई......!
अडवाणी जी की तो दिल की हसरत दिल में रह गई ,जो तो सही है लेकिन जनता ने रोजाना पैदा हो रहे नये-नये प्रधान मन्त्रियों के अरमानों की भी हत्या कर दी। बेचारे टी वी वाले और समाचार पत्रों वाले भी बडी उम्मीद लगाऐ बैठे थे कि चुनाव के बाद नतीजे आने पर सभी दल अपनी-अपनी ढपली बजाकर पीएम की कुर्सी की सौदे बाजी करेगें तो कम से कम कुछ दिनों का मसाला ही मिलेगा लेकिन जनता ने तो सभी की उम्मीदों पर ही पानी फेर दिया। इसीको कहते हैं लोकतन्त्र......! जहाँ जनता नेताओं की सुविधा से सरकार चुनने को बाध्य नहीं बल्कि अपनी सुविधा के अनुसार अच्छे- बुरे की पहिचान कर अपने विवेक से सही और गलत का स्वयं निर्णय लेने में सक्षम है।कुछ लोग जिन्हें शायद यह भ्रम होने लग था कि वे तो पैदा ही कुर्सी के लिऐ हुऐ हैं इस तरह के लोगों को अब अपनी सोच अवश्य ही बदलनी होगी।

Tuesday, May 5, 2009

मेरी ड्रेस का अब क्या होगा...?
आज सुबह -सुबह श्रीमती जी को न जाने क्या हुआ कि अखबार हाथ में लिऐ हमारे पास आई और बोली- आज का अखबार पढा आपने......! हम चकराऐ - भाग्यवान आज भला ऐसा क्या तूफान आगया जो तुम सुबह-सुबह इतनी परेशान हो रही हो...। वे तपाक से बोली - परेशानी की तो बात ही है जे डी बी गर्ल्स कालेज में इस साल से ड्रेस कोड लागू होगा। हमने कहा - भला इसमें परेशान होने वाली क्या बात है बल्की यह तो अच्छी बात है कि कालेज में ड्रेस कोड लागू होगा ..।हमारी तरफ से उनकी बात को समर्थन नहीं मिलना शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा। वे तपाक से बोली-क्या खाक अच्छी बात है ........तुम्हें मालूम है कि हमारी बिटिया ने बडे चाव से दो दर्जन नई ड्रेस सिलवाई थी, अब हो गई न सारी की सारी बेकार.........!हम परेशान भला कालेज जाने के लिऐ दो दर्जन ड्रेस.........?हमने कहा- श्रीमती जी कालेज जाने के लिऐ भला इतनी सारी ड्रेस सिलवाने की क्या जरूरत थी..?-तो आप क्या चाहते हैं कि हमारी बेटी दो जोडी कपडों में ही साल भर निकाल दे...?-भाग्यवान कालेज में लडकियों को हम पढ़्ने के लिऐ भेजते हैं या ड्रेस की नुमायश करने...?-आपकी समझ में ये बातें नहीं आने वाली स्कूल में तो बरसों यह मुई ड्रेस बच्चियों के पीछे पडी ही रहती थी अब कालेज में भी पीछा नही छोड रही है। बच्चियों का भी मन करता है कि थोडा अच्छा पहनें....आखिर हमारी बेटियों के भी तो कुछ अरमान हैं कि नहीं.....। यदि ये कालेज में ही मनपसन्द का नहीं पहिन सकेगी तो भला कब पहनेगीं.......?-देवी जी छात्राऐं कालेज में पढ़्ने के लिऐ जाती हैं या फिर अपनी ड्रेस दिखाने के लिऐ.....? पहिनने ओढ़ने के लिऐ तो सारी जिंदगी पडी है...... कम से कम पढ़्ने के समय , ड्रेस का चक्कर छोड्कर यदि पढ़ाई में ज्यादा ध्यान दिया जाऐ तो बहतर होगा...इन लडकियों के लिऐ भी और उनके मॉ-बाप के लिऐ भी....?-मर्दों को तो बेचारी बच्चियों का क्या पूरी महिला बिरादरी का ही पहिनना ओढ़्ना अच्छा नहीं लगता है......!अब भला मैं इन्हें कैसे समझाऊँ कि कालेज में लडकियां आजकल ऐसे ऐसे कपडे पहिन कर जाती हैं जिसे देखकर कभी कभी लगता है जैसे कि यह कालेज न होकर कोई फैशन शॊ का स्टेज हो.....?जो समृद्ध हैं वे तो अपनी अमीरी का प्रदर्शन करती ही हैं लेकिन मध्यम वर्ग और कमजोर तबके के लोगों के लिऐ अपनी बेटियों की जरूरते पूरी करना कई बार बूते से बाहर हो जाता है जिससे कुछ छात्राओं के मन में हीन भावनाऐं जन्म लेने लगती हैं। ऐसी स्थिति में कालेज स्तर पर भी ड्रेस लागू करने में भला बुराई भी क्या है....! लेकिन फिर भी पसन्द अपनी -अपनी ख्याल अपना- अपना....हम भला क्यों दाल भात में मूसल चन्द बने.....।

Wednesday, April 29, 2009

चुनाव के पहले और चुनाव के बाद

चुनाव के पहले और चुनाव के बाद



चुनाव के पहले और चुनाव के बादअखबार में एक विज्ञापन पर हमारी नजर पडी हम चौंके। बडा अजीब सा विज्ञापन था लिखा था- ‘चुनाव के पहले और चुनाव के बाद’स्थाई ताकत और मजबूती के लिऐ मिले या लिखे ‘खानदानी हकीम तख्ता सिंह’ साथ में पूरा पता और फोन नम्बर भी दिये थे।विज्ञापन पढकर हमें लगा कि जरुर इन हकीम साहब से मिलना ही चाहिऐ। आखिर हकीम साहब का भला चुनाव में मजबूती और ताकत से क्या लेना देना ..?भला ऐसी कौनसी जडी बूटी हो सकती है जिससे चुनाव में ताकत आ जाऐगी। हमसे अपने कदम नहीं रोके गये और पहुच गये हकीम साहब के शफाखाने पर......।वहाँ हमने देखा कि कुछ नेता टाइप लोग लम्बा कुर्ता पहिने पहले से ही अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे।हमनें भी वहाँ बैठे एक श्रीमान जी को अपना नाम लिखाया और अपनी बारी के इंतजर में बैठ गये। हमने देखा कि वहाँ पहले से मौजूद लोग एक-एक करके अपनी बारी आने पर अंदर जाते और हकीम साहब के पास से हाथों में कुछ पुडिया का पैकेट लेकर प्रसन्न मुद्रा में सीना फुलाकर बाहर निकलते मानो कि चुनाव के सबसे बडे पहलवान वे ही हॊं और उनके सामने सभी चींटी के बराबर ही हैं। हम इतमिनान से उनके चेहरों को पढ़ रहे थे। जब भी कोई व्यक्ति अन्दर जाता तो मुँह लटकाऐ,ढ़ीला -ढ़ाला सा अनदर जाता था लेकिन बाहर निकलते समय अजीब सा आत्मवि्श्वास और चेहरे पर नई चमक लिऐ हुऐ ही बाहर निकल रहा था।ऐसा लगता था जैसे चुना आयोग से नियुक्ति पत्र ही मिल गया हो। हमारी बारी आई तो हमने जैसे ही हकीम साहब के कक्ष मेंप्रवेश किया तो सामने भैय्या जी को देख कर हम चौकें और न चाहते हुऐ भी मुँह से निकल ही गया-अरे भैय्या जी आप और यहाँ.....हकीम तख्ता सिंह..... आखिर माजरा क्या है.........? वे तुरन्त हमारे मुँह पर हा्थ रखते हुऐ बोले -धीरे बोलिऐ कोई सुन लेगा तो सब करा धरा चौपट हो जाऐगा.......!मैने उन्हें आश्वस्त किया कि अब बाहर कोई नहीं है मैं आजका आपका अन्तिम फौकट का ग्राहक हूँ।आखिर ये माजरा क्याहै.....? आप अचानक भैय्या जी से हकीम तख्ता सिंह कैसे बन गये......?नेताओं में ताकत और मजबूती की दवा का नुस्खा आखिर आपको कहाँ से मिल गया.....? भैय्या जी बडे ही सहज भाव में बोले-नुस्खा-वुस्खा कुछ नहीं है बस यूँ ही पापी पेट का सवाल है......बस..।हम कुछ समझ नहीं पा रहे थे। हमने वहाँ रखे कुछ पारादर्शी डिब्बों की तरफ इशारा करते हुऐ उनसे पूछा- इन डब्बों में रंग बिरंगा पाउडर जो भरा है ,यह सब क्या है.....?वे सर खुजलाते हुऐ बोले - आप भी क्यों पीछे पडे हैं भला .....इनमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो लोगों के स्वास्थ पर बुरा असर दिखाऐ ।हकीकत तो ये है कि समाचार पत्रों में रोजाना आरहा था कि अमुक नेता कमजोर है .फलां उम्मीदवार कमजोर है ,प्रधान मन्त्री तक कमजोर माने जा रहें हैं इसलिऐ मैंने सोचा क्यों न ऐसी इजाद की जाऐ जिससे कोई भी इस चुनाव में अपने आपको कमजोर महसूस नहीं करे, बस ....।यही सोच कर कुछ दवा मैनें बनाई है। इन पारदर्शी डब्बों में भ्रष्टाचार, झूंठ, मक्कारी और बेहयाईपन का सत्व हमने इकट्ठा किया है जिसके सेवन से ईमानदार से ईमानदार नेता में भी नेतागिरी के वास्तविक गुण आजाते हैं। जिससे वह बिना शर्म्रोहया के चुनाव लड सकता है। चुनाव जीतने के बाद पता नहीं उसे शायद उन्हीं लोगों के साथ मिलकर सरकार में बैठना पड जाऐ जिनको आज वह जी खोल कर गालियां दे रहा है। आखिर ये लोग कुर्सी के लिऐ ही तो यह सब कर रहे हैं ।यदि इनमें नैतिकता का अंश बाकी रह जायेगा तो फिर भला सरकार कैसे बनाऐगें। भैय्या जी की बात भी सही है। तभी तो कल तक किसके किसीके साथ कैसे सम्बन्ध थे वे सब इतिहास की बाते हो गई है। और आज फिर एक नई समीकरण बन रही है। चुनाव के बाद की क्या समीकरण होगी वह तो चुनाव के बाद ही पता लगेगा कि कौन किसको गले लगाता है और कौन अपने चुनावी वादों पर कायम रह पाता है....यह तो वक्त ही बतायेगा....?